ध्यान से चेतना की द्रष्टि की ओर




ध्यान एक अवस्था है. इसमें रह कर खुद को जान न ओर फिर ध्यान की ही अवस्था में रहकर अपने सवालो के उत्तर की खोज करना उसमे आघे बढ़ना है. जो लोग नए नए ध्यान की अवश्था में आते है, उन्हें ये मालुम न होता है की क्या करे. एक जगह बैठना ओर वो करना जैसे किसिस ओर ने बताया है ध्यान नहीं हो सकता. ध्यान एक परिस्थिति है, किसी की बताई कोई तरकीब नहीं जिसमे बस चल दिए. ध्यान लगाना एक संपूर्ण एहसास है, जिसके परिणाम काफी मनमोहक हो सकते है.

  • खुद के शिखर को तलाशे

सबसे पहले, जब आप ध्यान करने बैठे, ये जान ले की इसमें आपको कुछ हासिल नहीं करना है. या ध्यान जब तक नहीं करना हैई जब तक कही सुनी बातो जैसे आभास हो जाये. कई लोग दावा करते है की उन्हें दिव्य रौशनी का अनुभव हुआ ओर ये सुनकर लोग मन में एक धारणा बना लेते है की जब तक उन्हें भी वो दिव्य रौशनी नहीं दिखेगी, ध्यान का असल मतलब प्राप्त न होगा. हर मनुष्य के लिए ध्यान अलग है ओर उसका परिणाम अलग. आपकी दिव्य रौशनी केवल एक संपूर्ण एहसास हो सकती है जो आप महसूस करे.




  • चेतना एवं बदलाव

हर मनुष्य के भीतर असंख्य स्त्रोत है, जिनका वो सही इस्तेमाल कर, खुद को उस राह पे ला सकता है, जिसके पीछे उसकी खोज जारी है. चेतना को सही राह पर मोड़ कर ध्यान एकाग्रित करना एक अनुभव ही नहीं अपितु बहुत मुश्किल काम है, उसके लिए जिसने ये पहले कभी नहीं किया. इसका मतलब ये नहीं जिसने ये नहीं किया वो कभी इसे कर नहीं सकता. ध्यान कोई किताब नहीं जिसे पढ़ा, संह ओर हो गया. ध्यान देखने का ढंग है ओर हर एक उसे अलग देखता व् महसूस करता है.

याद रखे, ध्यान ओर सम्पूर्णता एक ही सिक्के के दो पहलु है. यदि आप पहले से ही ध्यान कर रहे है, तो आप उसे जारी रखे, न उसे बंद करे, न ही किसी के बताये ज्ञान के पीछे भागे. जवाब सब भीतर है, पर जिंदगी के शोर ने उसे आपसे दूर रखा है. ध्यान वो शोर बंद कर देता है ओर जवाब अपने आप मिल जाते है.

 




Categories: Spiritual

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