रहस्य भीतर उठते सवाल का।




कभी खुद के भीतर झाँकने की कोशिश की है? या कभी ये सोचा है की क्या जो भी आसपास घटित हो रहा है, उसका आपसे भीतरी सम्बन्ध तो नहीं. मनुष्य सालो से जी तो रहा है, पर उसके मन में ऐसे कई सवाल है, जो कभी कभी उसे सोचने पर मजबूर कर देते है की ये न होता तो क्या होता या फिर जो हो रहा है, क्या वो सही है। इन्ही सब द्वन्द और द्वेष के बीच खुद ही के भीतर जवाब को जान लेना भी एक अपवाद है।

  • एक भीतरी सोच, एक बाहरी समझ

जन्म एवं मृतरू के बीच गहरा फासला है। मृत्यु निश्चित है, इसमें कोई दो सोच नहीं। पर मृत्यु से पहले ये जान लेना की जो जीवन जिया है, वो मृत्यु के काबिल है भी की नहीं, ये बहुत जरुरी है। जीवन जीना एक कला है, जो समझ जाता है, फिर वओ जीवन पहले जैसे नहीं जी पता। कई गुरुओ ने बातें कही है, जिनका उद्देश्य मनुष्य को अँधेरे से उजाले की और लाना है। जीवन जीना रोज़ एक जैसी चीज़े करना मात्र नहीं, अपितु उसमे डूब कर रस को पीना है।




  • बाहरी शोर, भीतरी शान्ति

कभी महसूस करि है अंदर की शान्ति? शायद नहीं. जीवन की भाग दर्द में ही लगे है। आज ये मीटिंग है, कल वो फाइल बनानी है, आज यहाँ जाना है, कल उसकी किश्त  देनी है। क्या जीवन में यही करना है? क्या जीवन का उद्देश्य इतना चोट मात्र रह गया है। समझ इन सब से ऊपर उठ के, इस जीवन के अर्थ में झाँकने की है। जहा कुछ हासिल करना, शायद कुछ हासिल करना नहीं है। मनष्य जिस दिन ये समझ गया, इसका रहस्य खुद ब खुद जान लेगा।

अथार्थ, जीवन को जियो, पर एक समझ के साथ। वो करते न चले जाओ जो तुम्हारे आस पास हर मनुष्य कर रहा है। जीवन एक सलीका है, जिसको बैठ कर, शान्ति से घूंट दर घूंट पियो। जीवन को होते देखना एक नाटक है, जहा जिस दिन खुद को नायक की तरह खेल में रंगते देख जान लोगे, जीवन का रस समझ आ जाएगा।




Categories: Mysteries

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