रूपकूंड झील – भारत की एक झील जिसमे तैरते है कंकाल!




रूपकूंड झील – भारत की एक झील जिसमे तैरते है कंकाल!

कल्पना कीजिए एक जमी हुई झील की, जो हर साल पिघलते ही 300 से अधिक लोगों के अवशेषों को अपनी सतह पर ला देती है| रुपकूंड झील के नाम से जानी जाने वाली एक छोटी झील भारत की हिमालय पर्वत शृंखला मे समुद्र तल से 16,000 फीट (4, 9 00 मीटर) से ज़्यादा की उचाई पर स्थित है| बर्फ में ढकी हुई और चट्टानी ग्लेशियरों से घिरी हुई झील सुंदर, प्राकृतिक आश्चर्य के बावजूद एक ठेठ सी प्रतीत होती है। हालांकि, वर्ष के एक महीने के दौरान, जब बर्फ पिघलती है और झील का तल साफ दिखाई देने लगता है, तब झील की असली प्राक्रतिक सुंदरता सामने आती है|  झील के तल पर सैकड़ों रहस्यमय मानव कंकाल हैं। यह पता करने के अनगिनत प्रयास किए गए हैं कि ये लोग कौन थे, वे कहां से आए थे, और वे कैसे मर गए, परंतु रूपकूंड झील के रहस्यमयी मानवी कंकालो के बारे मे कोई जानकारी नही मिली, जिसके चलते भारत के उत्तरांचल के चमोली जिले मे स्थित रुपकूंड को स्केलेटन झील के रूप में जाना जाने लगा है|

रूपकूंड झील मे कंकालो की खोज कब की गयी?

कंकाल अवशेषों के बारे में पहली रिपोर्ट 19वीं शताब्दी मे सार्वजनिक हुई थी, लेकिन 1942 में नंदा देवी गेम रिजर्व रेंजर एच के माधवाल ने अवशेषों की पुन: खोज की थी। उन्होंने झील के जमे होने के समय उसके नीचे कुछ कंकाल खोजे थे। जैसे ही गर्मी आई, और जमी हुए झील पिघली, झील में और झील के किनारों के चारों तरफ और अधिक कंकाल प्रकट हुए। ऐसा माना जाता है कि कंकालो की संख्या 300 के आसपास है।




जब खोज की गई, तो अवशेषों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध हुई| कोई भी नहीं जानता था कि अवशेष किसके हैं, वे कितने समय से यहाँ है, या उनके साथ क्या हुआ था। चूंकि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कंकालो को फिर से खोजा गया था, पहली धारणा यह थी कि ये सैनिकों के कंकाल थे, शायद जापानी सैनिक जो भारत के माध्यम से यात्रा करते समय किसी कारणवश मर गए थे। इस संभावना के कारण अवशेषों का स्रोत निर्धारित करना प्राथमिकता बन गया। जांचकर्ताओं की एक टीम रूपकूंड को भेजी गई, जहां उन्होंने यह पता किया कि यह अवशेष चल रहे युद्ध से बहुत पुराने थे।

बाद मे हुई जाँचो के साथ यह स्पष्ट हो गया कि अवशेषो मे केवल हड्डियो के अलावा बहुत कुछ शेष था| ठंडा तापमान, और सूखी ठंडी हवा ने, मांस, नाखूनों और बालों के बिट्स को भी संरक्षित किया था| इसके अलावा, लकड़ी की कलाकृतियों, लोहे के भाले, चमड़े के चप्पल, और गहने जैसी चीज़ो की भी खोज की गयी थी|

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रेडियोकार्बन एक्सेलेरेटर यूनिट ने अवशेषों पर रेडियोकार्बन डेटिंग के प्रयोग द्वारा निष्कर्ष निकाला कि अवशेष लगभग 850 ईसवी के है| सबूत की कमी के चलते यह निष्कर्ष निकाला गया की, जब यह लोग मरे तब यात्रा कर रहे थे। लेकिन उनकी मृत्यु के कारण क्या था? क्या वहां एक विशाल भूस्खलन हुआ था? क्या वहाँ अचानक कोई बीमारी फैल गयी थी? क्या वे भुखमरी से मरे? या दुश्मनो ने हमला कर के उन्हे मारा? अनेक सवाल है|

रूपकूंड झील के कंकालो से जुड़ी एक पौराणिक कथा:

एक स्थानीय दंतकथा है जो अवशेषों की पहचान पर कुछ प्रकाश डालती है। पौराणिक कथा के अनुसार, कनौज के राजा राजा जसधवल अपनी गर्भवती पत्नी रानी बलम्पा के साथ यात्रा कर रहे थे। नंद देवी मंदिर जाट के लिए तीर्थ यात्रा के दौरान वे नौकर, एक नृत्य मंडल और अन्य के साथ यात्रा कर रहे थे| यात्रा करते हुए अचानक उनका सामना आसमान से गिरते हुए बड़े ओलो के तूफान से हुआ| तूफान बहुत मजबूत था, और कहीं भी आश्रय लेने के लिए जगह नही थी, उसी तूफान मे पूरा समूह रूपकुंड के पास मारा गया। लंबे समय तक यह कहानी एक दंतकथा के रूप मे प्रचलित रही, इसके प्रमाण के लिए कोई सबूत नहीं है।

2013 में शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि यह संभावना है कि ओलो के तूफान में ही सभी की मौत हुई हो| अवशेषों पर मिले चोटों के निशान संकेत देते है कि प्रत्येक व्यक्ति को सिर, गर्दन और कंधों पर एक या अधिक चोंटे लगी है| उनके शरीर के किसी भी अन्य हिस्सों पर चोंटे नहीं है, जो यह दर्शाता है की भूस्खलन, हिमस्खलन या हथियारों से उनकी मृतु नही हुई थी| आज के समय में निष्कर्ष यह है कि लोगों के इस समूह की मृतु गंभीर गड़गड़ाहट से आए बड़े ओलो के तूफान से ही हुई थी| हालांकि, इस बात का कोई सत्यापन नहीं हुआ है कि यह एक समूह था जो कि कनौज के राजा के साथ यात्रा कर रहा था।

क्या है रूपकूंड की वर्तमान स्थिति?

आज रूपकूंड झील का संरक्षण एक चिंता का विषय है| कई ट्रेकर्स अवशेष देखने के लिए वहां की यात्रा करते है| बहुत से लोग खच्चर से वहां यात्रा करते हैं और अपने साथ हड्डियों और कंकालो को वहाँ से ले जाते है| घूमने आने वालो की बड़ी संख्या अवशेषों को नुकसान पहुँचा रही है|

हालांकि, वहाँ मारे गये लोगो के बारे मे कुछ जानकारियाँ मिली है, परंतु अभी जानने के लिए बहुत कुछ बाकी है| लेकिन यह संभावना कम होती जा रही है क्योंकि अधिक से अधिक अवशेष नष्ट होते जा रहे है| हिमालय में एक हजार साल पहले मारे गए लोगों के रहस्यमय समूह के बारे में अधिक जानने के लिए शोध की संभावना को संरक्षित करना जरूरी है।




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